आरती संग्रह

देवी-देवताओं की आरतियों का संग्रह भक्तों के लिए बना आस्था का केंद्र, जानें आरती का सही तरीका और महत्व

आरती करने से वातावरण पवित्र होता है और भक्त को मिलती है दिव्यता की अनुभूति। कई भक्त रोज़ाना आरतियों के संकलन से पूजा करते हैं, जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

 

आरती हिंदू पूजा-पद्धति का वह प्रमुख भाग है जो भक्त और ईश्वर के बीच के संबंध को प्रकट करता है। प्राचीन शास्त्रों और पुराणों में आरती को न केवल धार्मिक क्रिया बल्कि एक आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रवाह के रूप में भी बताया गया है। आरती करने की परंपरा सुबह और शाम दोनों समय होती है। कई घरों में, मंदिरों में या धार्मिक स्थलों पर दिन में चार से छह बार आरती होती है – जैसे मंगला आरती, भोग आरती, संध्या आरती आदि।

भक्त जब दीपक लेकर आरती करते हैं, तो वह दीपक केवल प्रकाश का प्रतीक नहीं बल्कि भक्ति और आत्मसमर्पण का प्रतीक बन जाता है। भगवान विष्णु की "ॐ जय जगदीश हरे", शिव की "जय शिव ओंकारा", गणेश जी की "जय गणेश देवा", लक्ष्मी माता की आरती, हनुमान जी की आरती और माँ दुर्गा की "जय अम्बे गौरी" – ये सब आरतियाँ भक्तों द्वारा रोज गाई जाती हैं।

आरती करते समय दीपक को दक्षिणावर्त यानी घड़ी की दिशा में घुमाया जाता है, जिससे वातावरण में सकारात्मक कंपन फैलते हैं। थाली में कपूर, फूल, रोली और चावल रखने की परंपरा है। मान्यता है कि आरती के समय जो भाव होता है, वही भगवान तक पहुंचता है। इसलिए भक्तजन शुद्ध भाव और शुद्ध वातावरण में आरती करते हैं।

 

 

Share on